अगर इस बात का यक़ीन हो कि गैर-मुस्लिमों का खाना हलाल और पाक-साफ़ है, और किसी मौक़े पर उसे खाना पड़ जाए तो उसे खाने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन इसकी मुस्तक़िल आदत बना लेना जो दोस्ताना ताल्लुक़ात को जन्म देता है, जायज़ नहीं है, इससे बचना चाहिए। (अहम मसाइल / जि: 6 / पृ: 278)