कुछ इलाक़ों में यह रिवाज होता है कि जिस औरत का कोई भाई नहीं होता, वह किसी अजनबी शख़्स को अपना मुंह बोला भाई बना लेती है; इसी तरह जिस आदमी की कोई बहन नहीं होती, वह किसी अजनबी औरत को अपनी मुंह बोली बहन बना लेता है, और इस मुंह बोले भाई या बहन को हक़ीक़ी भाई-बहन का दर्जा देकर उससे पर्दा भी नहीं किया जाता है, जबकि शरीयत में मुंह बोले भाई या बहन की कोई हैसियत नहीं है, वे अजनबी हैं, और उनसे पर्दा ज़रूरी है। (अहम मसाइल / जि: 6)