मुहक्कक मसाला

किसी व्यक्ति का किसी दूसरे व्यक्ति के कहने पर ग़ैर-अल्लाह के लिए मसलन किसी पीर या देवी-देवता के लिए बकरा वग़ैरह ज़बह करना, ख़्वाह उजरत (मज़दूरी) लेकर हो या बिना उजरत के, शरअन नाजायज़ और हराम है। साथ ही, इस ज़बीहा का खाना भी हराम है और ऐसे व्यक्ति की अज़ान, इक़ामत और इमामत मकरूह-ए-तहरीमी है। हाँ, अगर वह सच्चे दिल से तौबा कर ले, तो कराहत ख़त्म हो जाएगी। (अहम मसाइल / जि: 3 / पृ: 39)

ऐसी नमाज़ अब कौन पढ़ेगा?
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ऐसी नमाज़ अब कौन पढ़ेगा?

बयान किया जाता है कि एसाम बिन यूसुफ, हज़रत हातिम असम्म रहमतुल्लाह अलैह की मजलिस में आए और उन पर आपत्ति (ऐतराज़) करना चाहा। अतः एसाम ने हातिम से कहा: "ऐ अबू अब्दुल रहमान!" (यह हातिम की कुन्नियत है) "आप नमाज़ किस तरह अदा करते हैं?" हातिम रहमतुल्लाह अलैह ने उनकी ओर मुतवज्जोह होकर फ़रमाया: "जब नमाज़ का...

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