किसी व्यक्ति का किसी दूसरे व्यक्ति के कहने पर ग़ैर-अल्लाह के लिए मसलन किसी पीर या देवी-देवता के लिए बकरा वग़ैरह ज़बह करना, ख़्वाह उजरत (मज़दूरी) लेकर हो या बिना उजरत के, शरअन नाजायज़ और हराम है। साथ ही, इस ज़बीहा का खाना भी हराम है और ऐसे व्यक्ति की अज़ान, इक़ामत और इमामत मकरूह-ए-तहरीमी है। हाँ, अगर वह सच्चे दिल से तौबा कर ले, तो कराहत ख़त्म हो जाएगी। (अहम मसाइल / जि: 3 / पृ: 39)