अगर कोई व्यक्ति किसी से क़र्ज़ ले और क़र्ज़ख़्वाह (क़र्ज़ देने वाले) के पास अपनी मोटर साइकिल गिरवी रखे, तो क़र्ज़ख़्वाह के लिए उसका इस्तेमाल जायज़ नहीं है। अलबत्ता, अगर इस्तेमाल का किराया बाज़ारी दर के मुताबिक़ मुक़र्रर करके उसे क़र्ज़ में महसूब (शामिल) किया जाए तो यह जायज़ है, मगर अब अक़्द-ए-रहन (गिरवी کا معاہدہ) ख़त्म होकर अक़्द-ए-इजारा (किराए का معاہدہ) हो जाएगा, और तजदीद-ए-क़ब्ज़ा (क़ब्ज़े کا تجدید) ज़रूरी होगा। (अहम मसाइल / जि: 4 / पृ: 156)