जिस शादी में सेहरा बांधना, आतिशबाज़ी, फ़ोटोग्राफ़ी, वीडियो बनाना और दीगर (अन्य) रसूमात व खुराफ़ात (रीति-रिवाज़ और बुराइयां) हों, तो ऐसी शादी में शिरकत करना, ख़ास कर उन हज़रात उलमा के लिए जो मुक़्तदा (जिनकी पैरवी की जाती है) हों, और पहले से उन्हें इसका इल्म भी हो, दुरुस्त नहीं है। और अगर पहले से इसका इल्म नहीं था और हाज़िर हो गए, तो इन खुराफ़ात से रोक दें, और अगर रोकने की क़ुदरत नहीं तो वापस चले आएं, और शिरकत न करें। (अहम मसाइल / जि: 4 / पृ: 116)