अल्लामा शामी (रह.) 'साहिब-ए-हिल्या' के हवाले से नक़्ल करते हैं कि हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मुबारक, इस्हाक़, इब्राहीम और सौरी (रह.) फ़रमाते हैं: मुस्तहब यह है कि इमाम रुकूअ और सज्दे में तस्बीहात पांच-पांच मर्तबा पढ़े, ताकि मुक़्तदी हज़रात तीन-तीन मर्तबा पढ़ सकें। लिहाज़ा अगर इमाम ने इसका ख़याल नहीं रखा, तो उसका यह अमल मकरूह होगा। (अहम मसाइल / जि: 5 / पृ: 88)