गैरों की देखा-देखी मुस्लिम समाज में एक यह रस्म भी रिवाज पा चुकी है कि कुछ मॉडर्न और जदीद (आधुनिक) तालीम याफ्ता (शिक्षित) घरानों में मियां-बीवी यौम-ए-निकाह (शादी की सालगिरह) की याद में सैर-सपाटे और तफरीह (मनोरंजन) की ग़रज़ से निकलते हैं, होटल में डिनर करते हैं, आपस में एक-दूसरे को गिफ्ट वगैरह देते हैं, और हर साल इसका एहतिमाम करते हैं। जबकि यह कोई इस्लामी तरीका या शिआर नहीं कि इसका एहतिमाम किया जाए, बल्कि यह गैर-मुस्लिमों की तक़लीद (नक़ल) और क़ाबिल-ए-मज़म्मत (निंदनीय) अमल है, जो कई एक क़बाहतों (बुराइयों) पर मुश्तमिल और फ़ज़ूलखर्ची पर मबनी है। इसलिए इस रस्म-ए-बद (बुरी रस्म) से बहर-सूरत (हर हाल में) बचना ज़रूरी है। (अहम मसाइल / जि: 9 / पृ: 277)