मुहक्कक मसाला

अगर कोई व्यक्ति अपनी क़सम तोड़ दे तो उस पर क़सम का कफ़्फ़ारा लाज़िम होगा, और वह यह है: दस मिस्कीनों (ज़रूरतमंदों) को दो वक़्त का खाना खिलाना, या उनको कपड़ा देना, या एक ग़ुलाम आज़ाद करना। इन तीनों में इख़्तियार (विकल्प) है, जिससे चाहे कफ़्फ़ारा अदा करे, और अगर इन तीनों में से किसी एक पर भी क़ुदरत (सामर्थ्य) न हो तो तीन दिन लगातार रोज़े रखे।

कुछ लोग खाना खिलाने या कपड़ा देने पर क़ुदरत के बावजूद अपनी क़सम का कफ़्फ़ारा तीन रोज़े रखकर अदा करते हैं, और यह ख़याल करते हैं कि उनका कफ़्फ़ारा अदा हो गया, जबकि सही बात यह है कि कफ़्फ़ारा अदा नहीं हुआ, क्योंकि रोज़ों के ज़रिए अदायगी-ए-कफ़्फ़ारा सही होने के लिए खाना खिलाने और कपड़ा पहनाने से आजिज़ (असमर्थ) होना शर्त है। (अहम मसाइल / जि: 3 / पृ: 206)

आपका मकाम और अल्लाह की मर्जी
लेख

आपका मकाम और अल्लाह की मर्जी

किसी बुजुर्ग ने क्या ही खूब फरमाया है: अगर तुम यह जानना चाहते हो कि अल्लाह के नजदीक तुम्हारा मकाम क्या है, तो देखो वह तुम्हें किस काम में व्यस्त (मशगूल) रखता है: अगर वह तुम्हें अपने ज़िक्र में व्यस्त रखे, तो जान लो कि वह तुम्हें याद रखना चाहता है। अगर तुम्हें कुरान में व्यस्त करे, तो सम...

ट्रेंडिंग न्यूज़

सभी समाचार