ख़ुत्बा के दौरान बिल्कुल ख़ामोश रहना वाजिब है, और हदीस में यह वारिद है कि अगर कोई शख़्स बोल रहा हो तो उसे चुप कराने के लिए बोलना भी नाजायज़ है, लिहाज़ा जब इमाम आयत-ए-करीमा 'इन्नल्लाहा व मलाइक़तहू युसल्लूना अलन्नबिय्यि...' वग़ैरह पढ़े तो मुक़्तदियों को दिल ही दिल में दरूद शरीफ़ पढ़ना चाहिए, ज़बान से पढ़ना दुरुस्त नहीं, ख़ुत्बे के दौरान जब नमाज़ पढ़ना नाजायज़ है तो दरूद शरीफ़ पढ़ना बदरजा-ए-औला नाजायज़ होगा। (अहम मसाइल / जि: 1 / पृ: 87)