मुहक्कक मसाला

शरीअते इस्लामिया ने जहां बहुत से तफ़रीही खेलों की इजाज़त दी है, वहीं चंद ऐसे खेलों को जो आपसी झगड़ों, तज़ी-ए-औक़ात (वक़्त की बर्बादी), जुआ, क़िमार का ज़रिया हैं, सख़्ती के साथ मना फ़रमाया है, मसलन चौसर, शतरंज, कबूतर बाज़ी, मुर्ग़ बाज़ी, बटेर बाज़ी, पतंग बाज़ी, जानवरों को लड़ाना, वीडियो गेम, गोटी, लूडो, ताश खेलना वग़ैरह, इन तमाम खेलों में सिवाए नुक़्सानात के दीनी या दुनियावी कोई फ़ायदा नहीं, इसलिए ये सब ममनू (वर्जित) हैं। (अहम मसाइल / जि: 2 / पृ: 227)

खौफ-ए-इलाही (अल्लाह का डर) भी मारिफत (पहचान) का नतीजा है!!
लेख

खौफ-ए-इलाही (अल्लाह का डर) भी मारिफत (पहचान) का नतीजा है!!

इमाम जलालुद्दीन रूमी (रह.) ने लिखा है कि एक आदमी सफर पर निकला। वह एक जंगल में चलता रहा और बहुत दूर चलने के बाद उसे भारी थकान महसूस हुई, जिसके कारण उस पर नींद हावी हो गई। उसने सोचा कि कहीं आराम कर ले; लेकिन सिर्फ इसलिए हिम्मत नहीं हुई क्योंकि वह जंगल का रास्ता था। उसने सोचा, "जंगल के रास्ते में भला क...

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