मुहक्कक मसाला

अगर किसी क़ारी या मुतकल्लिम की क़िरात व आवाज़ को किसी आले में महफ़ूज़ कर लिया गया हो तो उसमें आयत-ए-सज्दा के सुनने से सज्दा-ए-तिलावत लाज़िम नहीं होगा, क्योंकि यह नक़्ल और अक्स है, नीज़ टेप रिकॉर्ड का भी यही हुक्म है।

लेकिन रेडियो में तक़ाज़ा-ए-एहतियात यह है कि आयत-ए-सज्दा सुन कर सज्दा-ए-तिलावत किया जाए, ब-शर्ते कि उससे अस्ल आवाज़ बराह-ए-रास्त सुनाई दे रही हो, कोई रिकॉर्ड कर्दा आवाज़ न हो। (अहम मसाइल / जि: 1 / पृ: 75)

पड़ोसियों का सम्मान और बेमिसाल सादगी:
लेख

पड़ोसियों का सम्मान और बेमिसाल सादगी:

हज़रत मौलाना सैयद असग़र हुसैन रहिमतुल्लाह अलैह (जो अपने मिलने वालों में हज़रत मियां साहब के नाम से मशहूर थे) दारुल उलूम देवबंद के उन उस्तादों में से थे जो शोहरत और नाम-ओ-नमूद (دکھاوے) से हमेशा कोसों दूर रहे। उन्होंने जीवन भर इस्लामी उलूम (ज्ञान) की तदरीस (शिक्षण) की सेवा की और हज़ारों छात्रों को अपन...

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