अगर किसी क़ारी या मुतकल्लिम की क़िरात व आवाज़ को किसी आले में महफ़ूज़ कर लिया गया हो तो उसमें आयत-ए-सज्दा के सुनने से सज्दा-ए-तिलावत लाज़िम नहीं होगा, क्योंकि यह नक़्ल और अक्स है, नीज़ टेप रिकॉर्ड का भी यही हुक्म है।
लेकिन रेडियो में तक़ाज़ा-ए-एहतियात यह है कि आयत-ए-सज्दा सुन कर सज्दा-ए-तिलावत किया जाए, ब-शर्ते कि उससे अस्ल आवाज़ बराह-ए-रास्त सुनाई दे रही हो, कोई रिकॉर्ड कर्दा आवाज़ न हो। (अहम मसाइल / जि: 1 / पृ: 75)