बिना ज़रूरत मस्जिद में खाना-पीना और सोना मकरूह है, अलबत्ता मुसाफ़िर और मोतकिफ़ (एतिकाफ़ करने वाले) के लिए मस्जिद में खाने, पीने और सोने की गुंजाइश है। इसी तरह अगर किसी शख़्स को ऐसी दीनी ज़रूरत पेश आ जाए, जो मस्जिद में सोए बिना हासिल न हो सकती हो, मसलन बा-जमात नमाज़ की पाबंदी नसीब होती हो, या तहज्जुद की तौफ़ीक़ होती हो, या मस्जिद की हिफ़ाज़त मक़सूद हो, तो उसके लिए भी मस्जिद में सोने की इजाज़त व गुंजाइश है। कुछ सहाबा किराम (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम अजमईन) भी दीनी ज़रूरत के लिए मस्जिद में सोते थे। (अहम मसाइल / जिल्द: 3 / सफ़ा: 246)