अगर कोई शख़्स एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक बिना टिकट सफ़र करे, जो जायज़ नहीं है, तो उसे चाहिए कि जितनी दफ़ा उसने बिना टिकट सफ़र किया, उतनी दफ़ा के किराये का हिसाब लगाकर टिकट ख़रीद ले और ज़ाया (नष्ट) कर दे, इस तरह इन शा अल्लाह उसका ज़िम्मा फ़ारिग़ हो जाएगा, क्योंकि इस सूरत में हक़, साहिब-ए-हक़ (हक़दार) को पहुँच जाता है। (अहम मसाइल / जिल्द: 5 / सफ़ा: 232)