मुहक्कक मसाला

फ़िक्स डिपॉज़िट में रक़म रखना जायज़ नहीं है। और अगर ला-इल्मी (अज्ञानता) में किसी ने रख दिया, तो सूद (ब्याज़) की रक़म को उसके मसारिफ़ (तय किए गए रास्तों) में ख़र्च करना ज़रूरी है। इसके मुत्तफ़िक़-अलैह (सर्वसम्मति से तयशुदा) मसारिफ़ दो हैं:

(1) ग़ैर-वाजिबी टैक्स। (2) फ़ुक़रा-ए-मुस्लिमीन (ग़रीब मुसलमान)।

सूद (ब्याज़) की रक़म को सूद (ब्याज़) में नहीं दे सकते।

बेहतर यही है कि मुत्तफ़िक़-अलैह (सर्वसम्मत) बात पर अमल किया जाए। शदीद ज़रूरत (अत्यधिक आवश्यकता) के वक़्त अगर मुख़्तलफ़-फ़ीह (जिस पर मतभेद हो) पर अमल कर लिया गया, तो बहरहाल इसकी गुंजाइश है। (हबीब अल-फ़तावा ज़िल्द: 7 / पृष्ठ: 172)

मैं अपनी स्मृति में तुम्हारे बारे में सब कुछ भुला दूंगा।
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मैं अपनी स्मृति में तुम्हारे बारे में सब कुछ भुला दूंगा।

हज़रत यह्या बिन मुआज़ रहमतुल्लाही अलैहि, जिनको हक़ायक़ व दक़ायक़ (आध्यात्मिक सच्चाइयों और बारीकियों) पर मुकम्मल दस्तरस (पूर्ण नियंत्रण) हासिल थी, और जिनके मुतअल्लिक़ (बारे में) कुछ बुज़ुर्गों का कहना है कि जिस तरह अम्बिया (पैगंबरों) में हज़रत यह्या बिन ज़करिया अलैहिमुस्सलाम का मक़ाम है, उसी तरह बुज़...

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