अगर कोई शख़्स नफ़्ल नमाज़ तन्हा पढ़ रहा हो, और एक ही आयत को मुकर्रर (बार-बार) पढ़े, तो नफ़्ल नमाज़ में तकरार-ए-आयत मकरूह नहीं है, और अगर फ़र्ज़ नमाज़ में बग़ैर किसी उज़्र व निस्यान (भूल-चूक) के मुकर्रर पढ़े, तो मकरूह है, वरना नहीं। (अहम मसाइल / जिल्द: 7 / सफ़ा: 159)