मुहक्कक मसाला

अगर कोई शख़्स नमाज़ में इतना आहिस्ता क़ुरआन करीम पढ़े कि हुरूफ़ अदा हो जाएँ लेकिन वह ख़ुद न सुन सके, तो मुफ़्ता-बिही क़ौल के मुताबिक़ उसकी नमाज़ दुरुस्त नहीं होगी, क्योंकि सिर्र की हद यह है कि आदमी ऐसी आवाज़ में क़िराअत करे कि वह ख़ुद उसे सुन सके; महज़ ज़बान की हरकत, बिना आवाज़ के क़िराअत के हुक्म में नहीं है। (अहम मसाइल / जिल्द: 1 / सफ़ा: 30)

ऐसी नमाज़ अब कौन पढ़ेगा?
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ऐसी नमाज़ अब कौन पढ़ेगा?

बयान किया जाता है कि एसाम बिन यूसुफ, हज़रत हातिम असम्म रहमतुल्लाह अलैह की मजलिस में आए और उन पर आपत्ति (ऐतराज़) करना चाहा। अतः एसाम ने हातिम से कहा: "ऐ अबू अब्दुल रहमान!" (यह हातिम की कुन्नियत है) "आप नमाज़ किस तरह अदा करते हैं?" हातिम रहमतुल्लाह अलैह ने उनकी ओर मुतवज्जोह होकर फ़रमाया: "जब नमाज़ का...

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