अगर कोई शख़्स नमाज़ में इतना आहिस्ता क़ुरआन करीम पढ़े कि हुरूफ़ अदा हो जाएँ लेकिन वह ख़ुद न सुन सके, तो मुफ़्ता-बिही क़ौल के मुताबिक़ उसकी नमाज़ दुरुस्त नहीं होगी, क्योंकि सिर्र की हद यह है कि आदमी ऐसी आवाज़ में क़िराअत करे कि वह ख़ुद उसे सुन सके; महज़ ज़बान की हरकत, बिना आवाज़ के क़िराअत के हुक्म में नहीं है। (अहम मसाइल / जिल्द: 1 / सफ़ा: 30)