ख़ूबसूरत डिज़ाइन वाले बुरक़ा का हुक्म:
मुआशरे (समाज) को पाकीज़ा रखने, फ़ितना-ओ-फ़साद के सद्द-ए-बाब (रोकथाम) और औरतों की इज़्ज़त, आबरू और नामूस की हिफ़ाज़त की ख़ातिर शरीअत-ए-मुतहहरा ने ख़वातीन को बा-पर्दा घर से बाहर निकलने की तालीम दी है। पर्दा ही की वजह से औरतों की शर्म-ओ-हया ताबिंदा रहती है, और फ़ुस्साक़-ओ-फ़ुज्जार (बदकार लोगों) की मसमूम निगाहों से ख़लासी नसीब होती है, और यह मक़सद उसी वक़्त हासिल हो सकता है, जब कि पर्दा और बुरक़ा में दर्ज़-ए-ज़ैल बातें मौजूद हों: (1) पूरे जिस्म को सातिर (ढकने वाला) और छिपाने वाला हो, वक़्त-ए-ख़ुरूज (बाहर निकलते वक़्त) चेहरा और हाथों को भी छिपाए। (2) इतना मोटा और ढीला हो कि जिस्म के आज़ा-ए-मस्तूरा (छिपने वाले अंग) या उसकी साख़्त नुमायां न हो। (3) ऐसे ख़ूबसूरत नक़्श-ओ-निगार वाला और पुर-कशिश न हो, जो मर्दों को अपनी तरफ़ माइल कर दे, क्योंकि बुरक़ा से मर्दों की तवज्जो हटाना मक़सूद है, और यह तो तवज्जोहात का मरकज़ बन गया। (अहम मसाइल / जिल्द: 10 / सफ़ा: 323)