दाढ़ी रखना इस्लामी और कौमी शिआर, तमाम अम्बिया की सुन्नत, शराफ़त व बुज़ुर्गी की अलामत और चेहरों का जमाल है, इससे मर्दाना शक्ल की तकमील होती है, और छोटे बड़े के दरमियान फ़र्क़ होता है, लिहाज़ा एक मुश्त दाढ़ी रखना वाजिब, और एक मुश्त तक पहुँचने से पहले मुंडवाना, काटना या कटवाना गुनाह-ए-कबीरा है। (अहम मसाइल / जि: 1 / पृ: 147)