मुहक्कक मसाला

तीजा, दसवां और चालीसवां करना कैसा है?

बाज़ इलाकों में मय्यित के ईसाल-ए-सवाब के लिए तीजा, सातवां, दसवां, चालीसवां, शशमाही और सालाना का खाना पका कर खिलाया जाता है, शरए इस्लामी में इसकी कोई अस्ल नहीं। शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी अपनी किताब "जामिउल बरकात" में तहरीर फ़रमाते हैं कि 'बेहतर आनस्त कि न खुरद', बेहतर यह है कि इस तरह का खाना न खाए। अगर किसी को ईसाल-ए-सवाब करना ही हो तो शरई तरीक़े पर करें, न इसमें खानों की क़ैद हो और न ही दिन मख़्सूस किए जाएं, जो कुछ हस्ब-ए-वुसअत मयस्सर आए ग़रीबों और मिस्कीनों में तक़्सीम कर दें, रस्म-ए-फ़ातिहा और क़ुल ख़्वानी वग़ैरह बिदअत हैं। (अहम मसाइल / जि: 2 / पृ: 39)

अल्लाह वालों की सोहबत (संगत) का असर
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अल्लाह वालों की सोहबत (संगत) का असर

हज़रत मौलाना यूसुफ़ बनूरी (रहमतुल्लाही अलैहि) ने एक मर्तबा एक मजलिस (सभा) में इर्शाद फ़रमाया कि: एक साल हम हज के लिए गए, वहाँ उलेमा (विद्वानों) के ग्रुप में एक रिटायर्ड फ़ौजी अफ़सर भी था। तहज्जुद के वक़्त वह फ़ौजी अफ़सर हम सब से पहले उठकर बैतुल्लाह शरीफ़ चला जाता और उस वक़्त तवाफ़ करता था। मौलाना फ...

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