बेहतर और मुस्तहब यह है कि हर मर्तबा हुज़ूर अकरम ﷺ का नाम-ए-मुबारक अदा करने वाला और सुनने वाले तमाम अहबाब आप ﷺ पर दुरूद-ओ-सलाम भेजें, लेकिन अगर पूरी मजलिस में बाज़ लोगों ने भी आप का नाम-ए-मुबारक सुन कर "सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम" कह दिया, तो इस सूरत में दीगर के हक़ में इसकी अदायगी साक़ित हो जाती है, जबकि पूरी मजलिस के दौरान आप ﷺ के मुबारक नाम पर, कम अज़ कम एक मर्तबा दुरूद-ओ-सलाम पढ़ना वाजिब है, जिसमें कोताही मोजिब-ए-इक़ाब है। (अहम मसाइल / जि: 10 / पृ: 45)