नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाने की वसीयत करना।
अगर कोई शख़्स अपने औलिया को यह वसीयत कर के मरे कि मेरी नमाज़-ए-जनाज़ा फ़लां शख़्स पढ़ाए, तो उसके औलिया पर इस वसीयत का पूरा करना लाज़िम नहीं है, ताहम अगर औलिया-ए-मय्यित उस फ़लां शख़्स से नमाज़ पढ़वाना चाहें, तो इसमें कोई हरज भी नहीं है। (अहम मसाइल / जि: 9 / पृ: 110)