मुहक्कक मसाला

अमल-ए-कसीर (अधिक हरकत) नमाज़ी के उस अमल को कहा जाता है जो इस्लाह-ए-सलात (नमाज़ सुधारने) के लिए न हो, और आमाल-ए-सलात (नमाज़ के कामों) में से भी न हो, और उसको इस अंदाज़ से किया जाए कि अचानक देखने वाला यह समझे कि यह शख़्स नमाज़ में नहीं है। ऐसे अमल से नमाज़ फ़ासिद (टूट) हो जाती है। बहुत से लोगों से नमाज़ में अमल-ए-कसीर सरज़द होता है, जिसकी वजह से उनकी नमाज़ फ़ासिद हो जाती है, मगर अमल-ए-कसीर की यह तारीफ़ (परिभाषा) मालूम न होने की वजह से वह यह समझते हैं कि उनकी नमाज़ हो गई, इसलिए नमाज़ में ख़ूब इत्मिनान और सुकून से खड़ा होना चाहिए। (तब्बीन अल-हक़ाइक : 412/1) (माखूज़ अज़ : दरसी व तालीमी अहम मसाइल पृ: 112)

खामोश परिंदा
लेख

खामोश परिंदा

हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) के दौर में एक शख़्स ने एक ख़ूबसूरत परिंदा ख़रीदा। वह जब चहचहाता तो उसकी अत्यंत दिलकश और सुरीली आवाज़ से वह शख़्स बहुत ख़ुश होता, मानो उस परिंदे की आवाज़ बहुत ही मीठी और प्यारी थी। एक दिन अचानक उस पिंजरे के पास उसी की तरह का एक और परिंदा आया और अपनी ज़बान में कुछ बातें...

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