ऐ नफ़्स (मन/आत्मा)! क्या ऐसी मूल्यहीन और तुच्छ चीज़ भी हासिल करने के काबिल है जिसे घटिया से घटिया और नीच से नीच व्यक्ति भी हासिल कर सकता है, बल्कि वे इसे हासिल किए हुए हैं और इतनी बड़ी मात्रा में हासिल किए हुए हैं कि अगर तू पचास साल भी कोशिश करेगा तो तुझे नसीब न होगा? और ऐ नफ़्स! अगर तू दुनिया से मुंह मोड़कर आख़िरत (परलोक) की तरफ ध्यान लगाएगा, तो याद रख कि तू दुनिया में बेमिसाल और अपने ज़माने में अनोखा बन जाएगा; तेरा सानी (दूसरा) सातों लोकों (हफ़्त इक़्लीम) में भी नहीं मिल सकेगा। इसलिए ऐ नफ़्स! अब तू ही बता कि कौन सी चीज़ हासिल करने के काबिल है? ऐ नफ़्स! अच्छी तरह याद रख कि तुझसे ज़्यादा तेरा शुभचिंतक कौन है? तू किसी के कहने या सुनने पर मत जा, बल्कि दुनिया और दीन (धर्म) दोनों के अंजाम और नतीजे पर खुद गौर करके जवाब दे कि तेरी रुचि किस चीज़ में है?
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