"गुनाहों की सबसे बड़ी सज़ा यह है कि बंदा अपने नफ़्स (आत्मा) को भुला दे, अल्लाह तआला की ओर से दिए जाने वाले अपने हिस्से को ठुकरा दे और अल्लाह की अता (वरदान) को तुच्छ व कमतर क़ीमत के बदले बेच दे। चुनाँचे, गुनाहगार बंदा ऐसी चीज़ ज़ाया (नष्ट) कर देता है जिसका कोई बदल (विकल्प) ही नहीं है।
शायर कहता है:
مِنْ كُلِّ شَيْءٍ إِذَا ضَيَّعْتَهُ عِوَضُ
وَمَا مِنَ اللهِ إِنْ ضَيَّعْتَهُ عِوَضُ
'हर चीज़ का, जिसे आप ज़ाया कर दें, कोई न कोई एवज़ (बदला) होता है,
लेकिन अगर आप अल्लाह को छोड़ दें (खो दें), तो उसका कोई एवज़ नहीं है।'
चुनाँचे, अल्लाह अपने सिवा हर चीज़ का एवज़ अता फ़रमाता है और कोई भी चीज़ अल्लाह का एवज़ नहीं हो सकती।
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(हर वह चीज़ जिससे तू जुदा हुआ, उसका कोई न कोई बदल है; लेकिन अगर तू अल्लाह से जुदा हो गया, तो उसका कोई बदल नहीं है।)"