मल्फ़ूज़: सोहबत के आसार (संगति का प्रभाव)
*मल्फ़ूज़ात-ए-हकीम-उल-उम्मत मुजद्दिद-उल-मिलत हज़रत मौलाना मुहम्मद अशरफ़ अली थानवी रहमतुल्लाह अलैह*
*सोहबत के आसार (संगति का प्रभाव)*
इरशाद फ़रमाया कि अगर अपने अख़्लाक़ (चरित्र/व्यवहार) की इसलाह (सुधार) करना है, तो किसी ऐसे शख़्स की सोहबत (संगति) इख़्तियार कीजिए जो अख़्लाक़-ए-हमीदा (उत्कृष्ट चरित्र) रखता हो और उससे तअल्लुक़ (संबंध) पैदा कीजिए और उसकी पैरवी (अनुसरण) कीजिए। यह है वो इलाज जिससे बुरे अख़्लाक़ दूर होते हैं और अच्छे अख़्लाक़ पैदा होते हैं; और महज़ पढ़ने-पढ़ाने से यह काम नहीं हो सकता।
सोहबत अजब चीज़ है, सोहबत जब शर्तों के साथ यानी आज्ञाकारिता के इरादे के साथ पाई जाए, तो ज़रूर असरदार होती है। तजुर्बा (अनुभव) कर लीजिए कि एक ग़ुस्सैल आदमी जो बात-बात पर लोगों से लड़ता हो, चंद रोज़ एक हलीम (सहनशील) और बर्दाश करने वाले आदमी के पास बैठे, तो उसमें हिलम (सहनशीलता) पैदा हो जाएगा; या इसके विपरीत एक हलीम और शांत स्वभाव का आदमी किसी ग़ुस्सैल आदमी के या किसी अधिकारी (हुकूमत वाले) के पास चंद रोज़ बैठे, तो उसमें ज़रूर कुछ न कुछ तेज़ी और गर्मी पैदा हो जाएगी।
हयादार (शर्मीले/सदाचारी) आदमी के पास बैठने से हया, और बे-हया आदमी के पास बैठने से बे-हयाई, और बक-बक करने वाले के पास बैठने से बक-बक करना और फ़ुज़ूलगोई (व्यर्थ की बातें), और बा-वक़ार (प्रतिष्ठित/गंभीर) आदमी के पास बैठने से सुकूत (मौन) और वक़ार (गरिमा) पैदा होता है। ये आसार (प्रभाव) सोहबत से पैदा होते हैं, लिखने-पढ़ने और किताबों को देखने से नहीं होते।
(अस्-सूक़ लि-अह्लिश्-शौक़, मवाइज़-ए-अशरफ़िया, जिल्द 3, सफ़्हा 96)