हाफ़िज़ सख़ावी (रहमतुल्लाह अलैह) लिखते हैं:
«اجْتَنِبْ أَيُّهَا الْكَاتِبُ الرَّمْزَ لَهَا أَي لِلصَّلَاةِ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى الله عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي خَطِكَ، بأن تَقْتَصِرَ مِنْهَا عَلَى حَرْفَيْنِ، وَنَحْوِ ذلِكَ، فَتَكُونَ مَنْقُوصَةٌ صُورَةٌ، كَمَا يَفْعَلُهُ الكُسَالَى وَالْجَهَلَةُ مِنْ أَبْنَاءِ الْعَجَمِ غَالِبًا وَعَوَامُ الطَّلَبَةِ، فَيَكْتُبُونَ بَدَلًا عَنْ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ : ص ، أَوْ صم، أَوْ صلم، أَوْ صلعم، فَذَلِكَ لِمَا فِيهِ مِنْ نَّقْصِ الأَجْرِ لِنَقْصِ الكِتابَةِ خِلافُ الأولى»
"ऐ लिखने वाले! अपनी लिखाई में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर दरूद का इस तरह का प्रतीक (शॉर्टकट/रमज़) लिखने से परहेज़ करो कि तुम दो, तीन या चार अक्षरों पर ही बस (इक्तिफ़ा) कर लो। इस तरह दरूद का स्वरूप अधूरा (नाक़िस) हो जाता है, जैसा कि सुस्त और बहुत से जाहिल ग़ैर-अरबों (अजमीयों) का तरीक़ा है, और आम छात्र (तलबा) भी इस ग़लती का शिकार हैं। वे 'सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम' की जगह 'स', 'सम', 'सलम' या 'सलअम' लिखते हैं। यह तरीक़ा लिखावट में कमी के कारण पुण्य (अज्र) में कमी आने की वजह से नापसंदीदा (ग़ैर-मुस्तहसन) है।"
[फ़तह-उल-मुग़ीस ब-शर्ह अल्फ़िय्यत-उल-हदीस: 3/71-72]