आज हमारे समाज में यह माहौल आम हो गया है कि कानून तोड़ने को एक हुनर (कला) समझा जाता है। कानून को खुलेआम तोड़ा जाता है और इसे बड़ी होशियारी और चालाकी समझा जाता है। यह मानसिकता वास्तव में इस वजह से पैदा हुई क्योंकि जब हम हिंदुस्तान में रहते थे और वहां अंग्रेजों की हुकूमत थी, तो अंग्रेज गसब (अवैध कब्जा) करने वाले थे, उन्होंने हिंदुस्तान पर जबरन कब्जा किया था। मुसलमानों ने उनके खिलाफ आजादी की जंग लड़ी। 1857 के मौके पर और बाद में भी उनके साथ लड़ाई का सिलसिला जारी रहा, और अंग्रेजों की हुकूमत को मुसलमानों ने कभी दिलो-जान से स्वीकार नहीं किया। इसलिए हिंदुस्तान में अंग्रेजों की हुकूमत के खिलाफ उलेमा-ए-किराम (विद्वानों) ने यह फतवा भी दिया कि कानून तोड़ो, क्योंकि अंग्रेजों की हुकूमत एक जायज हुकूमत नहीं थी—हालांकि कुछ उलेमा इस फतवे का विरोध भी करते थे। बहरहाल, उस समय कानून तोड़ने का एक औचित्य (जवाज़) था।
अब कानून तोड़ना जायज नहीं है।
लेकिन अंग्रेजों के चले जाने के बाद जब पाकिस्तान बना, तो यह एक समझौते के तहत अस्तित्व में आया। इसका एक दस्तूर (संविधान) और कानून है, और पाकिस्तान के कानून पर भी यही हुक्म लागू होता है कि जब तक वह कानून हमें किसी गुनाह पर मजबूर न करे, तब तक उसकी पाबंदी करना वाजिब (अनिवार्य) है। इसलिए कि हमने यह अहद (वादा) किया है कि हम इस मुल्क के नागरिक हैं, इसलिए हम इसके कानून की पाबंदी करेंगे।