हज़रत मुजद्दिद अलिफ़ सानी (रहमतुल्लाह अलैह) के एक ख़लीफ़ा ने आपको ख़त लिखते हुए अपने इस्लाही (सुधारात्मक) और मिल्ली (राष्ट्रीय/सामुदायिक) कारनामे गिनाए, कि आज-कल मैं वाज़ (उपदेश) भी कह रहा हूँ, दरस-ओ-तदरीस (शिक्षण) भी कर रहा हूँ, तस्नीफ़-ओ-तालीफ़ (लेखन और संकलन) भी जारी है......... वगैरह वगैरह।
हज़रत ने जवाब में एक अजीब (अद्भुत) बात फ़रमाई, जो हम सबके लिए बेहद ध्यान देने योग्य है। फ़रमाया कि:
"मियाँ! यह सब तो तुम दूसरों का काम कर रहे हो? और इस तरह की ख़िदमात (सेवाएं) तो अल्लाह तआला 'रजुल-ए-फ़ाजिर' (एक पापी/दुराचारी व्यक्ति) से भी ले लेते हैं।
तुम तो यह बताओ कि तुम्हारे ज़ाती (व्यक्तिगत) आमाल (कर्म) और अहवाल (आध्यात्मिक स्थितियां) कैसे चल रहे हैं? तज़किया-ए-क़ल्ब (दिल की पाकीज़गी) और इस्लाह-ए-नफ़्स (आत्म-सुधार) का मामला कैसा है?"
हज़रत के इस मफ़हूम (विषय) को सामने रखते हुए अगर आज हम अपने हालात का जायज़ा लेते हैं, तो मामला बेहद नाज़ुक नज़र आता है।
क्योंकि जिस इल्म (ज्ञान) का मक़सद और महवर (केंद्र) अपनी फ़िक्र और इस्लाह के बजाय, सिर्फ़ दूसरों पर नज़र हो जाए, तो उसका मामला ख़तरनाक हो जाता है।