विश्वास (आत्मविश्वास)
आपने देखा होगा कि बत्तख के बच्चे जब अंडों से निकलते हैं, तो शुरू-शुरू में झील में बत्तख के ऊपर सवार होते हैं। बत्तख उनको लेकर तैरती है। कुछ दिनों बाद अचानक एक दिन बत्तख अपना शरीर झटकती है और बच्चे पानी में गिर जाते हैं।
प्रकृति (कुदरत) उनका मार्गदर्शन करती है और सहज वृत्ति (इंसटिंक्ट) कुछ ही देर में उन्हें तैराक बना देती है।
मान लेते हैं कि बत्तख ऐसा न करे तो क्या होगा?
अगर बत्तख ऐसा न करे, तो हर गुज़रते दिन के साथ बच्चों का वज़न बढ़ता चला जाएगा और बत्तख उनके वज़न से ही डूब जाएगी। इसी तरह अगर मुर्गी अपने बच्चों को दाना चुगना न सिखाए, तो वे चूज़े बिल्ली का शिकार हो जाएंगे।
यही हाल हम इंसानों का है।
हम बच्चों को धूप-छांव (ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव) से बचाते-बचाते प्रकृति के रास्ते में रुकावट बनने लगते हैं। यह भूल जाते हैं कि जिस रब ने हमारे अंदर उनकी सुरक्षा की शक्ति और हिम्मत पैदा की है, ये उसी रब के बंदे हैं। हम उनकी ज़िंदगियों को रिमोट कंट्रोल की तरह पैरेंट-गाइड कंट्रोल से बांध देते हैं। वक़्त गुज़रता है, उनका बोझ बढ़ जाता है और हम थक-हारकर एक दिन किसी एक बात या किसी एक वजह को पकड़कर उन्हें झटक कर दूर कर देते हैं।
अचानक बड़ा बच्चा दुनिया के बाज़ार में अकेले अपनी ज़िम्मेदारी के लिए संघर्ष करने लगता है, तब उसके पास सब कुछ होते हुए भी आत्मविश्वास नहीं होता; क्योंकि आत्मविश्वास हासिल करने के दौर में हमने उन्हें अपने खुद के बनाए हुए डर के पर्दों में छुपाकर रखा होता है।
अपने बच्चों पर भरोसा (विश्वास) करें।
उन्हें ज़िंदगी के बाज़ार को समझने दें। याद रखें!! चलना सिखाने के लिए उंगली पकड़ी जाती है, कंधों पर बिठाकर रखने से कोई चलना नहीं सीखता।