"एक मोमिन (आस्थावान) को अपने गुनाहों पर जो दर्द और तकलीफ़ हो...
Ummah Post
15 June, 2025

"एक मोमिन (आस्थावान) को अपने गुनाहों पर जो दर्द और तकलीफ़ होती है, वह एक परिंदे की तकलीफ़ से कहीं ज़्यादा होती है जब उसे कहीं पटका जाए या फेंका जाए।"

— अब्दुल्ला बिन अम्र बिन अल-आस (रज़ियल्लाहु अन्हु) [अज़-ज़ुहद वर-रक़ाइक़ लि-इब्न अल-मुबारक (63)]

अगर तुम उसे तन्हाइयों में देखो तो वह दिल को राख करके रोता हुआ, रंज-ओ-मलार से बिलखता हुआ, और आँखों से चश्मे (आँसू) बहाता हुआ दिखेगा। तुम उसे देखो (और पहले से जानते न हो) तो गुमान करोगे कि उसका कोई जान-ए-जिगर (प्रियजन) बिछड़ गया है।

हालाँकि मामला यह नहीं है।

उसे तो अपने दीन (धर्म) का ग़म खाए जा रहा है कि उस पर कोई आफ़त न आ जाए। दुनिया जाती है तो जाए, दीन सलामत रहे। यही दीन उसकी कुल पूंजी है, और इसी के बर्बाद होने का उसे डर है।

— अल-ग़ुरबा लिल-आजुरी

(ऐ अल्लाह! दुनिया को हमारे ग़मों का केंद्र न बनाना)

"काश मैं कोई राख होता जिसे हवाएँ उड़ा ले जातीं।"

— सैय्यदिना इमरान बिन हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु)

इमाम इब्न अक़ील अल-हंबली (रहमतुल्लाह अलैह) फ़रमाते हैं:

"मैंने लोगों के हालात का जायज़ा लिया तो बड़ा ही अजीब मामला पाया... वे घरों के उजड़ने पर रोते हैं, प्यारों की मौत पर आहें भरते हैं, आर्थिक तंगी पर हसरतें करते हैं और ज़माने को बुरा-भला कहते हैं! हालाँकि वे देखते हैं कि इस्लाम की इमारत गिर रही है, दीन फ़िरक़ों में बंट चुका है, सुन्नतें मिट रही हैं और बिदअतों (कुप्रथाओं) का ग़लबा है, गुनाहों की कसरत है! लेकिन उनमें से अपने दीन के लिए रोने वाला कोई नहीं है, अपनी उम्र बर्बाद करने पर किसी को अफ़सोस नहीं है, अपने वक़्त को ज़ाया करने पर कोई ग़म नहीं है!! और मैं इस सबका एक ही सबब (कारण) देखता हूँ कि दीन उनकी नज़रों में हल्का हो गया है और दुनिया उनकी फ़िक्रों का केंद्र बन चुकी है!"

— [अल-आदाब अश्-शरिया लि-इब्न मुफ़्लिह: 3/240]

"रूए-ज़मीन (धरती) पर तन्हाई ही मुझे रास आती है। मैं अकेले जीता हूँ, अकेले ही खाता हूँ और अकेले ही ग़ौर-ओ-फ़िक्र करता हूँ। ख़ुशी के वक़्त भी तन्हा होता हूँ और दुखों का साथी भी कोई नहीं। अगर तो यह तन्हाई लुत्फ़ और राहत का कारण है, तो यह फ़ानी (नश्वर) दुनिया की एक राहत है और बस! और अगर यह तन्हाई कर्ब (पीड़ा) और हसरत का सबब है, तब भी यह इसी दुनिया का एक कर्ब है और बस..."

— [जम्हरात मक़ालात अश्-शेख़ महमूद मुहम्मद शाकिर: 2/842]

कौल: "ऐ रब! मेरा दिल बिगड़ चुका है, और अगर मैं तुझे इसी हाल में मिला तो डरता हूँ कि तू मुझे अज़ाब (दंड) देगा।"

— शेख़ समीर मुस्तफ़ा

"बदन का मर्ज़ (बीमारी) तो मौत के साथ ख़त्म हो जाएगा, मगर दिल का मर्ज़ मौत के बाद भी अज़ाब बना रहेगा।"

— [मुख़्तसर मिन्हाज अल-क़ासिदीन लि-इब्न क़ुदामा: 188]

"टूटे दिल"

"मुनकसिरिन (टूटे हुओं) के साथ भी नर्मी बरतनी चाहिए, यानी वो लोग जिन्हें कोई दुख पहुँचा हो और वो टूट चुके हों। यह हड्डियों का टूटना नहीं, दिल का टूटना है। जैसे किसी पर कोई आफ़त आए और वह दिवालिया हो जाए, या किसी का क़रीबी या दोस्त फ़ौत (शांत) हो जाए तो उसका दिल बिखर जाए! बहरहाल ऐसों के साथ हमदर्दी ज़रूरी है, इसीलिए शरीअत ने ताज़ियत (शोक प्रकट करने) का तसव्वुर दिया है।"

— [शरह रियाज़ अस-सालिहीन लि-इब्न उथैमीन: 3/80]

"ओ फ़ानी (नश्वर) लज्ज़तों के रसिया! मौत की सख़्तियों के लिए भी कुछ तैयार किया है?! अपने सूद-ओ-ज़ियां (नफ़े-नुक़सान) का कभी हिसाब लगाया है?! क्या तुम्हें लगता है कि तुम नर्म-ओ-गदाज़ (मखमली) बिस्तरों पर लेटकर अहल-ए-शर्फ़ (प्रतिष्ठित लोगों) के दर्जों तक पहुँच जाओगे?! हरगिज़ नहीं!..."

— [अल-मुदहिश लि-इब्न अल-जौज़ी: 206]

"यह दुनिया तो महज़ ग़मों और मुसीबतों की आमादगाह (केंद्र) है।"

— हसन बसरी [अज़-ज़ुहद लि-इब्न अबी अद्-दुनिया: 478]

"दुआ के साथ ऐसा जुड़ जाएं कि गोया दुआ के अलावा कोई इलाज आप जानते ही नहीं!"

"यह न कहो कि ऐ रब मेरा ग़म बहुत बड़ा है, बल्कि कहो: ऐ ग़म! मेरा रब बहुत बड़ा है।" 🌻

इमाम मालिक बिन दीनार (रहमतुल्लाह अलैह) फ़रमाते हैं:

"सल्फ़ सालेहीन (पुण्य पूर्वज) तीन चीज़ों की वसीयत किया करते थे: ज़ुबान बंद रखने की, कसरत से इस्तिग़फ़ार (क्षमा याचना) करने की, और लोगों से किनाराकश (दूर) रहने की!"

— [सिफ़त अस-सफ़वाह: 3/196]

ताहिर अल-मक़दिसी (रहमतुल्लाह अलैह) फ़रमाते हैं:

"सलामत का राज़ लोगों से किनाराकशी में है, और हक़ीक़ी ख़ुशी अल्लाह अज़्ज़-व-जल्द से ख़लवत (तन्हाई में इबादत) में है।"

— [तबक़ात अल-औलिया, पृष्ठ: 394]

इमाम वुहैब बिन अल-वर्द (रहमतुल्लाह अलैह) फ़रमाते हैं:

"हिकमत (बुद्धिमत्ता) के दस हिस्सों में से नौ ख़ामोशी के हैं और दसवां हिस्सा लोगों से किनाराकश रहना है!"

ख़त्ताबि कहते हैं: "इनमें सबसे बेहतर हिस्सा लोगों से अलग-थलग रहना है!"

— [अल-उज़लाह, 1/18]

इमाम अद्-दुनिया अहमद बिन हंबल (रहमतुल्लाह अलैह) फ़रमाते हैं:

"मेरी एक असंभव सी ख़्वाहिश है कि कोई ऐसी जगह हो जहाँ लोगों में से कोई न आ सके।"

"मुझे लगता है कि तन्हाई मेरे दिल को ज़्यादा भाती है।"

"मेरा दिल करता है कि मैं मक्का की किसी घाटी को मस्कन (आवास) बना लूँ, फिर मुझे जानने वाला कोई न हो।"

"अब्दुल वहाब से कहना कि गुमनामी इख़्तियार करे, क्योंकि मैं शोहरत की आज़माइश (प्रसिद्धि की परीक्षा) से दो-चार हो चुका हूँ।"

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मदरसा के छात्रों की पाकीज़गी
लेख

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शेख़ुल क़ुरआन मौलाना मुफ़्ती मुहम्मद ज़रवली ख़ान साहब (रह.) फ़रमाते थे: मदारिस (मदरसों) के तलबा (छात्र) बहुत पाक मख़्लूक़ (पवित्र जीव) हैं। एक दिन हमारे मदरसे में एक तालिब-ए-इल्म (छात्र) को शरारत पर मैंने सज़ा दी, तो कुछ देर बाद मेरे हाथ ने हरकत करना छोड़ दिया और वह मुर्दा (बेजान) हो गया। मैंने...