"दोस्त तीन तरह के होते हैं: ग़िज़ा (भोजन) की तरह, जिसके बिना गुज़ारा नहीं होता; दवा की तरह, जिसकी कभी-कभार ज़रूरत पड़ती है; और दाअ (बीमारी) की तरह, जिसकी कोई ज़रूरत नहीं होती।"
— अब्बासी ख़लीफ़ा अल-मामून (वफ़ात 218 हिजरी)
[बहजत अल-मजालिस लि-इब्न अब्द अल-बर्र: 151]