गत रात्रि, एक लड़की इनबॉक्स में आई और सलाम के बाद कहा: "आप '...
Ummah Post
17 June, 2025

गत रात्रि, एक लड़की इनबॉक्स में आई और सलाम के बाद कहा: "आप 'महिला' और 'महिलाओं के परदे' पर बहुत लिखते हैं, पर्दा तो दिल का होता है।"

मैंने कहा: "खाना खाने/चबाने के बाद कहाँ जाता है?" वह कहने लगीं: "पेट में।"

मैंने कहा: "पेट तक पहुँचाने के लिए खाना कहाँ डालना पड़ता है?" "ज़ाहिर है, मुँह में।"

मैंने कहा: "तो मैं भी तो यही बताना चाहता हूँ, जिस तरह खाना पेट में होता है, मगर वहाँ पहुँचाने के लिए मुँह में डालना पड़ता है; उसी तरह पर्दा दिल में होता है, दिल तक पहुँचाने के लिए इसे सर पर रखना पड़ता है।"

कुछ देर सोचकर वह फिर बोली: "कुछ लड़कियाँ तो दुपट्टा ओढ़कर भी 'बापर्दा' (मर्यादित) नहीं होतीं, फिर...?"

मैंने कहा: "कुछ लोगों को तो खाना भी हज़म नहीं होता, उल्टी (قے) हो जाती है; इसमें क़सूर 'परदे' और 'खाने' का नहीं, समस्या 'मैदे' (पेट) और 'दिल' में है।"

— मनक़ूल (उद्धृत)

Share this article
मतभेदों के बावजूद बेमिसाल इत्तिहाद – क़ैसर-ए-रोम को एक ऐतिहासिक जवाब
लेख

मतभेदों के बावजूद बेमिसाल इत्तिहाद – क़ैसर-ए-रोम को एक ऐतिहासिक जवाब

हज़रात-ए-सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) में कुछ मसलों पर मतभेद (इख़्तिलाफ़) रहा है; मगर एक-दूसरे के सम्मान (एहतराम) में कभी फ़र्क़ नहीं आया। कौन नहीं जानता कि ख़ून-ए-उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) के मसले पर सहाबा-ए-किराम में शदीद (गंभीर) मतभेद हुआ और इसकी वजह से जंग भी हुई; मगर क्या मजाल कि उनके इस...