गत रात्रि, एक लड़की इनबॉक्स में आई और सलाम के बाद कहा: "आप 'महिला' और 'महिलाओं के परदे' पर बहुत लिखते हैं, पर्दा तो दिल का होता है।"
मैंने कहा: "खाना खाने/चबाने के बाद कहाँ जाता है?" वह कहने लगीं: "पेट में।"
मैंने कहा: "पेट तक पहुँचाने के लिए खाना कहाँ डालना पड़ता है?" "ज़ाहिर है, मुँह में।"
मैंने कहा: "तो मैं भी तो यही बताना चाहता हूँ, जिस तरह खाना पेट में होता है, मगर वहाँ पहुँचाने के लिए मुँह में डालना पड़ता है; उसी तरह पर्दा दिल में होता है, दिल तक पहुँचाने के लिए इसे सर पर रखना पड़ता है।"
कुछ देर सोचकर वह फिर बोली: "कुछ लड़कियाँ तो दुपट्टा ओढ़कर भी 'बापर्दा' (मर्यादित) नहीं होतीं, फिर...?"
मैंने कहा: "कुछ लोगों को तो खाना भी हज़म नहीं होता, उल्टी (قے) हो जाती है; इसमें क़सूर 'परदे' और 'खाने' का नहीं, समस्या 'मैदे' (पेट) और 'दिल' में है।"
— मनक़ूल (उद्धृत)