("बेटा, अगर मेरा सर ऊँचा नहीं कर सकते तो कोई ऐसा काम तो मत करो जिससे मेरा सर नीचा हो")
एक सेकेंडरी स्कूल के मास्टर कहते हैं कि मैंने स्कूल के बाहर लिखवा दिया था कि "स्कूल की इमारत पर लिखना मना है"। एक दिन जब मैं स्कूल पहुँचा तो क्या देखता हूँ कि किसी ने स्कूल की सारी बाहरी दीवारों को अत्यंत बेरहमी से स्प्रे पेंट के साथ अभद्र बातें लिखकर और गंदे नक़्श-ओ-निगार बनाकर ख़राब कर डाला है। मेरे स्कूल के लिए यह पहली और दुखद घटना थी। मैंने स्कूल जाकर कुछ स्टाफ़ की ज़िम्मेदारी लगाई कि इस हरकत को करने वाले बच्चे का पता लगाएं। हाज़िर-ग़ायब (उपस्थिति) का रिकॉर्ड देखने और कुछ बच्चों से पूछताछ के बाद हमें एक लड़के के बारे में पता चल गया जिसने यह हरकत की थी। उसी दिन मैंने उस लड़के के पिता को फ़ोन करके कहा, "मैं आपसे मिलना चाहूँगा, कल आप स्कूल तशरीफ़ लाएं।"
दूसरे दिन जब लड़के का बाप आया तो मैंने उससे सारा क़िस्सा कह डाला। बाप ने अपने बेटे को बुलवाने के लिए कहा। बेटे के आने के बाद उसने बड़े धीमे लहजे में उससे इसकी पुष्टि की। लड़के ने स्वीकार किया तो बाप ने वहीं बैठे-बैठे एक रंगसाज़ (पेंटर) को फ़ोन करके बुलाया, दीवारों को पहले जैसा रंग करने की बात की, मुझसे अपने बेटे के व्यवहार के लिए माफ़ी मांगी, अनुमति लेकर उठा और अपने बेटे के सर पर शफ़क़त (प्यार) से चूमा और धीमी सी आवाज़ में उससे कहा:
"बेटा, अगर मेरा सर ऊँचा नहीं कर सकते तो कोई ऐसा काम तो ना करो जिससे मेरा सर नीचा हो," और यह कहते हुए वह चला गया। मैंने देखा कि लड़के ने अपना मुंह अपने दोनों हाथों में छिपा लिया था, साफ़ दिखाई दे रहा था कि वह रो रहा है।
मुझे बहुत हैरानी हो रही थी कि लड़के के बाप ने क्या ख़ूब मनोवैज्ञानिक तरीक़ा अपनाया था। उसकी छोटी सी बात ने जो काम कर दिखाया था, वैसा नतीजा तो मार-पीट से भी हासिल ना हो पाता। मैंने लड़के के हाव-भाव देखने के लिए उससे पूछा, "बच्चे, तेरा बाप बहुत दयालु और सम्मानित इंसान है और उसने तुझे कोई ख़ास डांट-फटकार भी नहीं की, फिर तुझे किस बात पर रोना आ रहा है......?"
लड़के ने कहा: "सर, इसी बात पर तो रोना आ रहा है कि काश मेरा वालिद (पिता) मुझे मारता और सज़ा देता, मगर ऐसी बात ना कहता।" लड़के ने मुझसे माफ़ी मांगी और अनुमति लेकर चला गया। फिर मैंने देखा कि उस बच्चे ने मेरे स्कूल में उत्कृष्ट प्रदर्शन दिखाया और हर क्लास में टॉप किया।
सच कहा किसी ने कि औलाद को प्यार-मोहब्बत से समझाना चाहिए ना कि डंडे से या गाली-गलौज से। औलाद को अच्छा दोस्त बनाकर रखो, वरना बुरे लोग उनसे दोस्ती करके उन्हें बुरा बना देंगे।