मल्फ़ूज़: अहले हक़ (सत्य पर चलने वालों) के विरोधियों के चेहरों पर इल्म (ज्ञान) का नूर नहीं पाया जाता
*मल्फ़ूज़ात-ए-हकीमुल उम्मत मुजद्दिदुल मिल्लत हज़रत मौलाना मुहम्मद अशरफ़ अली थानवी रहिमहुल्लाह*
*अहले हक़ के विरोधियों के चेहरों पर इल्म का नूर नहीं पाया जाता*
इरशाद फ़रमाया कि जो लोग अहले हक़ को सब-ओ-शतम (गाली-गलौज और बुरा-भला) करते हैं, उनके चेहरों पर इल्म का नूर नहीं पाया जाता, बल्कि ख़ालिस कुफ़्फ़ार (पक्के काफ़िर) भी इतने मम्सूख़ (विकृत/बदरंग) नहीं पाए जाते जितने ये लोग हैं। इसकी वजह मैंने बतौरे लतीफ़ा (एक बारीक बात के रूप में) कही थी कि कुफ़्र फे़ल-ए-बातिन (आंतरिक कर्म) है, उसका असर छुपा रहता है और सब-ओ-शतम फे़ल-ए-ज़ाहिर (बाहरी कर्म) है, उसका असर नुमाया (ज़ाहिर) हो जाता है। अंग्रेज़ी ख़्वानों (अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे लोगों) पर नूरे ईमान न सही मगर शान तो होती है, इनमें वह भी नहीं, ख़ुदा बचाए।
(अदबुल ऐतदाल, मवाइज़-ए-अशरफ़िया, जिल्द 2, सफ़्हा 246)