✿ तिलावत का हक़
अल्लामा ग़ज़ाली रहिमहुल्लाह (वफ़ात: 505 हिजरी) फ़रमाते हैं:
क़ुरआन की तिलावत का हक़ तो यह है कि इसमें ज़बान, अक़्ल और दिल शरीक (शामिल) हों; ज़बान तरतील (ठहर-ठहर कर पढ़ना) के साथ हुरूफ़ की सही अदायगी में मदद करे, अक़्ल व दानिश मआनी (अर्थ) को वाज़ेह करते जाएं, और दिल नसीहत व फ़रमांबरदारी के ज़रिए असर क़बूल करे; पस ज़बान तरतील में, अक़्ल तर्जुमानी में और दिल नसीहत क़बूल करने में मसरूफ़ (व्यस्त) हो।
इह्या उलूमुद्दीन: 1/287