यह बेबसी के आलम (स्थिति) में अपनी अदना सी (छोटी सी) कोशिश का इज़हार है!
यह ग़ज़ा के इश्यू को हाइलाइट और ज़िंदा रखने के लिए इक़दाम (क़दम) है!
यह ग़ज़ा के मजलूम (पीड़ित) भाइयों के साथ इज़हारे-यकजेहती (एकजुटता का प्रदर्शन) है!
यह आलमी दुनिया (वैश्विक दुनिया) को ग़ज़ा पर होने वाले संगीन ज़ुल्म की तरफ मुतवज्जो (आकर्षित) करने की कोशिश है!
यह हस्बे-इस्तताअत (क्षमता के अनुसार) कुछ कर गुज़रने की एक झलक है!
यह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वालों के दिलों पर एक दस्तक है!
यह संगीन इस्राइली मज़ालिम (अत्याचारों) के ख़िलाफ़ रिकॉर्ड किया जाने वाला एहतिजाज (विरोध) है!
यह मुस्लिम दुनिया को झंझोड़ने की अदना सी काविश (कोशिश) है!
यह आलमी ज़मीर (वैश्विक अंतरात्मा) को बेदार (जाग्रत) करने की इक सई (प्रयास) है!
यह शऊर (जागरूकता) को बेदार करने और बेदार रखने की इक मुहिम (अभियान) है!
यह तारीख़ (इतिहास) में इस्राइली मज़ालिम को दर्ज करने वाला इक सियाह (काला) बाब (अध्याय) है!
सो आप क्यों ख़ामोश हैं?
आप क्यों ग़ाफ़िल (लापरवाह) हैं?
दुआ क्यों नहीं करते?
तआवुन (सहयोग) क्यों नहीं करते?
आवाज़ क्यों बुलंद नहीं करते?
बायकाट क्यों नहीं करते?
जो कुछ बस में है वो करते रहिए और ग़ज़ा के इश्यू को मुसलसल (लगातार) हाइलाइट और ज़िंदा रखिए, यह वक़्त का एक अहम तक़ाज़ा (मांग) है!
✍️... बंदा मुबीन उर रहमान
मोहल्ला बिलाल मस्जिद, न्यू हाजी कैम्प, सुल्तानआबाद, कराची