नोहा-ए-ग़ज़ा (ग़ज़ा का मर्सिया)
पहले हमें भूख की सलीब पर लटकाया गया,
पानी के एक-एक क़तरे को तरसाया गया।
और फिर, जब हड्डियों में हवा ने भी पनाह लेना छोड़ दी,
हमें राशन की क़तारों में लगाया गया।
न शहरी कहा गया, न इंसान,
बल्कि हदफ़ (निशाना), जिसे धकेल कर ज़िल्लत की मिट्टी में दफ़्न करना था।
जब एक थैला आटे का क़िस्मत से हाथ आया,
तो सीने को चीरती एक गोली ने कहा:
"यह तुम्हारे नसीब का नहीं, मेरी बंदूक की मश्क़ (अभ्यास) का हिस्सा था।"
इज़राइल ने अपने कमसिन (कम उम्र) फ़ौजियों को
ग़ज़ा की गलियों में तैनात किया।
न किसी दुश्मन फ़ौज से मुक़ाबला था,
न कोई अस्करी मोरचा (सैन्य बंकर),
बस एक मासूम बच्चा था,
जिसे रोटी की तलाश में मारा गया।
और फिर ख़ुशी से कंधे पर थपकी दी गई:
"निशाना बिल्कुल दुरुस्त लगा!"
यह वह तरबियतगाह (प्रशिक्षण केंद्र) है जहाँ इंसानी जान
सिर्फ़ निशानाबाज़ी की एक मश्क़ है।
जहाँ भूख, प्यास और क़तार में खड़ा होना
फ़िलिस्तीनी का जुर्म और सज़ा दोनों बन गया है।
ऐ आसमाने-सब्र (धैर्य के आकाश)!
अब कब बरसेंगे वो आँसू,
जो ज़मीन पर बारूद बनकर टूटें?
ऐ मिल्लते-ख़ामोश (शांत कौम)!
क्या तुम्हारी नींद
एक रोटी के थैले से सस्ती है?
क्या तुम्हारे ज़मीर की क़ुफ़्लशुदा (ताला लगी) आँख
ग़ज़ा की इन बे-कफ़न लाशों से भी नहीं खुलती?
हम मर रहे हैं,
लेकिन सिर्फ़ जिस्म नहीं,
लफ़्ज़, आह, चीख़!
और नोहे (मर्सिये) भी शहीद हो रहे हैं।
रह गई है तो सिर्फ़ बंदूक,
और उसका सीधा होता निशाना…
फ़िलिस्तीनी बच्चों के सीनों पर।