क्या औरत अकेले तरबियत (परवरिश) नहीं कर सकती ❗ ⬇️
इतिहास गवाह है कि बहुत से महान विद्वानों (उलेमा) को उनकी माताओं या करीबी महिलाओं ने ही संवारा है और महानता की राह दिखाई है।
🔹 इमाम बुखारी को उनकी वालिदा (माता) ने तरबियत दी।
🔹 इमाम शाफ़ई को उनकी वालिदा ने शिक्षा और तरबियत के ज़ेवर से आरास्ता (सुसज्जित) किया।
🔹 इमाम अहमद बिन हम्बल की परवरिश भी उनकी वालिदा के हाथों हुई।
🔹 इमाम हाफ़िज़ इब्न हज्र की परवरिश उनकी बहन ने की।
🔹 इमाम इब्न तैमिया का नाम उनकी दादी "तैमिया" की तरफ से है, जो एक विदुषी (फ़ाज़िला) और उपदेशक (वाइज़ा) महिला थीं।
✦ औरतें ही मर्दों की असल साज़गाह (निर्माणकर्ता) हैं।
जब औरत संवरती है तो घर संवरता है और जब घर संवरता है तो पूरा समाज निखर जाता है।
संक्षेप में यह कि औरत की तरबियत, किरदार और इल्म व शऊर (ज्ञान और समझ) का असर नस्लों तक जाता है।