"क़ूवत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर दे,
दहर में इस्म-ए-मोहम्मद (ﷺ) से उजाला कर दे।"
अपने इश्क़ (प्रेम) की ताक़त से हर पस्ती (गिरावट) को ऊँचाई पर ले जा और इस दुनिया में मुहम्मद (ﷺ) के मुबारक नाम की रोशनी फैला दे।
(व्याख्या: ग़ुलाम रसूल मेहर)
तुम सरवर-ए-दो आलम (दोनों जहाँ के मालिक) ﷺ के इश्क़ में फ़ना (लीन) हो जाओ और यक़ीन रखो कि इस इश्क़ की बदौलत तुम्हारे अंदर यह ताक़त पैदा हो जाएगी कि तुम सारी दुनिया में सरवर-ए-दो आलम ﷺ का नाम बुलंद कर दोगे।
(व्याख्या: यूसुफ़ सलीम चिश्ती)
हवाला (संदनर्भ):
कलाम: अल्लामा मुहम्मद इक़बाल (ؒ)
किताब: बांग-ए-दरा (तीसरा हिस्सा)
नज़्म: जवाब-ए-शिकवा
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