आजकल इश्क-ए-मिजाजी (लौकिक प्रेम) की नई से नई कहानियों पर आधारित उपन्यास (ناول) लिखे जा रहे हैं। अखबार-ए-जहां जैसे पत्रिकाएं (मैगजीन) भी ऐसी कहानियों से भरी होती हैं। "तीन औरतें, तीन कहानियां" के शीर्षक पर ऐसी घटनाएं लिखी जाती हैं कि युवा लड़के-लड़कियां बड़े शौक से पढ़ते हैं और कई बार खुद भी वैसा ही करना शुरू कर देते हैं। जो युवा किसी से जान-पहचान (आशनाई) नहीं कर पाते, वे तन्हाई में काल्पनिक कहानियां अपने जेहन में सोचकर गुनाहों में मुब्तिला (लिप्त) हो जाते हैं। विचार अपवित्र (नापाक) हो जाते हैं। चाहे ज़ाहिर में वे नमाज़ और रोज़ा भी रखते हों, लेकिन दिल में काल्पनिक महबूब की तस्वीर सजाए फिरते हैं। नमाज़ पढ़ते हुए भी उसी की याद में लीन (मुनहमक) होते हैं; ऐसा लगता है जैसे किसी काल्पनिक बुत (मूर्ति) की पूजा कर रहे हों।
पश्चिमी (फ़रंगी) देशों में पोर्नोग्राफी के नाम पर बिल्कुल नग्न तस्वीरें छापी जा रही हैं। वयस्कों (बालिगों) के आकर्षण के लिए महिलाओं के शरीर के गुप्त अंगों की नज़दीक से ली गई तस्वीरें छपती हैं। इन तस्वीरों को देखना इस कदर फसाद (बिगाड़) का कारण है कि शहवत (वासना) के मारे बूढ़ा गधा भी जवान बन जाए। (या अल्लाह! इस फितने (बुराइयों) से भरे दौर में हमारी हिफ़ाज़त फ़रमा। आमीन)।