"ऐ गुनाहों की कसरत (अधिकता) का बोझ उठाए, और गिरिया व ज़ारी (रोने-धोने) से महरूम शख्स!
अपने अश्कों (आंसुओं) के क़हत (सूखे) पर रोया कर।
असलाफ़ (पूर्वज) तो बेहतरीन तक़्वा (परहेज़गारी) के मालिक थे मगर फिर भी रोते थे। तेरे पास गुनाहों का अंबार है और तू हंसता है।"
[अल-ख़वातिम लि-इब्न अल-जौज़ी: 254]