*ईज़ा-ए-मुस्लिम (मुसलमान को तकलीफ़ पहुँचाने) की आम सूरतें*
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*ज़बान से ईज़ा (तकलीफ़)*
ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई), चुग़ली, गाली-गलौज, सख्त लहजा, तंज़िया (व्यंग्यात्मक) अलफ़ाज़।
*दिल आज़ारी*
किसी को कमतर समझना, इज़्ज़त-ए-नफ़्स (आत्मसम्मान) को मजरूह (ठेस) करना, बेवजह डांट-डपट।
*झूठ और फ़रेब*
लेन-देन या वादों में धोखा देना।
*बदगुमानी और तोहमत*
बिला तहक़ीक़ (बिना जांच के) इल्ज़ाम लगाना या नीयत पर हमला करना।
*माली ईज़ा*
क़र्ज़ अदा न करना, मज़दूर की मज़दूरी रोकना, नाज़ायज़ मुनाफ़ा ख़ोरी।
*जिस्मानी ईज़ा*
मार-पीट, धक्का देना, बिलावजह सख़्ती करना।
*हुक़ूक़ की पामाली (अधिकारों का हनन)*
पड़ोसी के हुक़ूक़ नज़रअंदाज़ करना, रास्ता तंग करना, शोर व तकलीफ़ देना।
*अहद शिकनी (वादा ख़िलाफ़ी)*
वादा ख़िलाफ़ी, मुआहदे (समझौते) तोड़ना।
*ज़ातिया अशिया (निजी चीज़ों) का नाहक़ इस्तेमाल*
किसी की चीज़ बग़ैर इजाज़त इस्तेमाल करना या नुक़सान पहुँचाना।
*नाइंसाफ़ी व ज़ुल्म*
इख़्तियारात (अधिकारों) या ताक़त का ग़लत इस्तेमाल, कमज़ोर को दबाना।
*यह वो सूरतें हैं जो हमारे घरों, इदारों (संस्थानों), बाज़ारों और मोहल्लों में रोज़मर्रा दिखाई देती हैं। इनके सद्दे-बाब (रोकथाम) से ही मुआशरा (समाज) राहत व सुकून का गहवारा बन सकता है।*