"ज़फ़र आदमी उसको न जानिए गा, हो वह कैसा ही साहब-ए-फ़हम-व-ज़क...
Ummah Post
21 September, 2025

"ज़फ़र आदमी उसको न जानिए गा, हो वह कैसा ही साहब-ए-फ़हम-व-ज़का (बुद्धिमान और चतुर),

जिसे ऐश (सुख) में याद-ए-ख़ुदा न रही, जिसे तैश (क्रोध) में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न रहा!

— बहादुर शाह ज़फ़र मरहूम"

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बा-जमात नमाज़ की अहमियत और मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब की आज्ञाकारिता
लेख

बा-जमात नमाज़ की अहमियत और मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब की आज्ञाकारिता

मुझे याद है कि देवबंद में जब मेरी उम्र तक़रीबन दस-बारह साल थी, एक दिन फज्र की नमाज़ के वक़्त सख़्त आंधी, मूसलाधार बारिश और गरज-चमक की बिना पर (वजह से) वालिद साहब (मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब) मस्जिद तशरीफ़ न ले जा सके और नमाज़ घर में ही अदा फ़रमाई। उधर दादा अब्बा, जो मस्जिद के आशिक़ और नमाज़ बा-जमात क...