आए दुनिया में बहुत पाक व मुकर्रम (पवित्र और सम्मानित) बन कर,
आया न मगर कोई रहमत-ए-आलम (संसार के लिए दयालु) बन कर।
दमकता रहे तेरे रौज़े का मंज़र, सलामत रहे तेरे रौज़े की जाली,
हमें भी अता हो वह शौक़-ए-अबूज़र, हमें भी अता हो वह जज़्बा-ए-बिलाली।
थकी है फ़िक्र-ए-रसाँ (सोच और बुद्धि), मदह (प्रशंसा) बाक़ी है, क़लम है आबला-पा (थका हुआ/छालेदार), मदह बाक़ी है,
वरक़ (पन्ने) तमाम हुआ, मदह बाक़ी है, और उम्र तमाम लिखा, मदह बाक़ी है।