ज़फ़र अली ख़ान ने कहा:
"दियार-ए-यसरिब (मदीना की सरज़मीन) में घूमता हूँ, नबी की दहलीज़ चूमता हूँ।
शराब-ए-इश्क़ पी कर झूमता रहूँ; रहे सलामत पिलाने वाला।"
शेख़-उल-हिन्द (रह.) ने जन्नत से मुख़ातिब (संबोधित) होकर फ़रमाया:
"तुझ में हूर व क़सूर (महल) रहते हैं, मैंने माना ज़रूर रहते हैं।
मेरे दिल का तवाफ़ कर जन्नत, मेरे दिल में हुज़ूर (ﷺ) रहते हैं।"