"कभी जब गुफ़्तगू (बातचीत) फ़रमाते थे मोती पिरोते थे,
कि सब...
Ummah Post
30 September, 2025

"कभी जब गुफ़्तगू (बातचीत) फ़रमाते थे मोती पिरोते थे,

कि सब अल्फ़ाज़ (शब्द) वाज़ेह (स्पष्ट), ग़ैर-मुबहम (असंदिग्ध), साफ़ होते थे।

कलाम (भाषण) ऐसा मुकम्मल (पूर्ण), जामे (व्यापक) व पुर-मग़्ज़ (अर्थपूर्ण) हक़्क़ानी (सत्य से भरपूर),

न बिल्कुल मुख़्तसर (संक्षिप्त), मुग़लक़ (कठिन/जटिल), अधूरा ही न तूलानी (लंबा)।"

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हुज़ूर ﷺ का अपने साथियों के साथ सुलूक
लेख

हुज़ूर ﷺ का अपने साथियों के साथ सुलूक

हज़रत हुसैन बिन अली (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) फ़रमाते हैं कि मैंने अब्बा जान सैयदुना अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) से पूछा कि हुज़ूर ﷺ अपने हम-नशीनों (साथियों) के साथ कैसे रहते थे? आपने फ़रमाया: "आप ﷺ ख़ंदा-रू (हँसमुख), ख़ुश-अख़लाक़ (अच्छे आचरण वाले) और नर्म-ख़ू (नर्म स्वभाव के) थे। बद-अख़लाक़ी, सख़्त-मिज़ाजी...