"कभी जब गुफ़्तगू (बातचीत) फ़रमाते थे मोती पिरोते थे,
कि सब अल्फ़ाज़ (शब्द) वाज़ेह (स्पष्ट), ग़ैर-मुबहम (असंदिग्ध), साफ़ होते थे।
कलाम (भाषण) ऐसा मुकम्मल (पूर्ण), जामे (व्यापक) व पुर-मग़्ज़ (अर्थपूर्ण) हक़्क़ानी (सत्य से भरपूर),
न बिल्कुल मुख़्तसर (संक्षिप्त), मुग़लक़ (कठिन/जटिल), अधूरा ही न तूलानी (लंबा)।"