*माँ की बददुआ का असर — आज नहीं तो कल*  

बुजुर्गों ने एक व...
Ummah Post
18 October, 2025

*माँ की बददुआ का असर — आज नहीं तो कल*

बुजुर्गों ने एक वाक़िया (घटना) लिखा है कि एक मासूम बच्चा रो रहा था, माँ ने गुस्से में आकर इस तरह कह दिया कि "तू मर जाए!" अल्लाह तआला को जलाल आ गया और अल्लाह तआला ने उसकी बददुआ को क़बूल फ़रमा लिया, मगर बच्चे को उस वक़्त मौत न दी। जब वह बच्चा बड़ा हुआ, तो ऐन जवानी के आलम में वह माँ-बाप की आँख की ठंडक बना और माँ-बाप के दिल का सुकून बना। जो भी उस बच्चे की जवानी देखता, वही हैरान रह जाता। ऐन जवानी के आलम में जब वह फल पक चुका, तो अल्लाह तआला ने उसे तोड़ लिया। एक मीठा, रसीला, साफ़, सुनहरा, जवान सा सेब धड़ाम से ज़मीन के फ़र्श पर टपक पड़ा; उसे मौत दे दी।

अब वही माँ रो रही है कि मेरा जवान बेटा बिछड़ गया, मगर उसे बताया गया कि "यह तेरी वही दुआ (बददुआ) है जो तूने बच्चे के लिए माँगी थी। मगर हम ने फल को उस वक़्त नहीं काटा, उसे पकने दिया। जब यह फल पक चुका, अब इसे काटा है ताकि तेरे दिल को अच्छी तरह दुख हो। अब क्यों रोती है? यह तेरे अपने हाथों की कमाई है।"

कितनी बार ऐसा होता है कि माँ बददुआएँ कर देती है, और जब अपने सामने देखती है कि बददुआएँ क़बूल हुईं, तो फिर रोती फिरती है कि मेरे बेटे का एक्सीडेंट हो गया, मेरे बेटे की ज़िंदगी ख़राब हो गई। ऐ बहन! यह सब कुछ इसलिए होता है कि तू अपने मुक़ाम (मर्तबे) से ना-आशना (अनजान) है। तुझे मालूम होना चाहिए कि अगर तू नमाज़ पढ़ती और अपने बच्चे के लिए दुआ करती, तो अल्लाह तआला तेरे बच्चे का बख़्त (क़िस्मत) जगा देते; माँ की दुआ हिफ़ाज़त की ज़ामिन (गारंटी) है।

एक बुज़ुर्ग के बारे में आता है कि उनकी वालिदा (माता) का इंतक़ाल हो गया। चुनाँचे अल्लाह तआला ने उस बुज़ुर्ग को इल्हाम (आकाशवाणी/संकेत) फ़रमाया कि "ऐ मेरे प्यारे! अब ज़रा संभल कर रहना, जिसकी दुआएँ तेरी हिफ़ाज़त करती थीं, वह हस्ती दुनिया से उठ गई है।" अल्लाह-हूँ-अकबर! वाक़ई बात ऐसी ही है कि माँ-बाप की दुआएँ बच्चों के गिर्द (चारों तरफ) पहरा देती हैं।

*📗 अहल-ए-दिल के तड़पा देने वाले वाक़यात (दिल को छू लेने वाली घटनाएँ)*

Share this article
निष्कपटता की मिसाल
लेख

निष्कपटता की मिसाल

जब हज़रत साद बिन अबी वक़्क़ास (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने मदायन को फ़तह (विजय) किया, तो उन्होंने ऐलान करवाया कि जिस मुजाहिद (योद्धा) के पास जो भी माल-ए-ग़नीमत (युद्ध की सामग्री) है, वह सब लाकर एक जगह जमा करवाए ताकि हम उसे तक़्सीम (वितरित) कर सकें। लोग माल-ए-ग़नीमत जमा करवाने लग गए। तीन दिन गुज़र गए और ऐस...