जीवन का उद्देश्य (मक़सद) क्या है?
दुनिया में मौजूद हर चीज़ का कोई न कोई मक़सद है; बिना मक़सद के कुछ भी नहीं है क्योंकि बिना मक़सद के किए गए काम को 'फ़ेल-ए-अबस' (व्यर्थ कार्य) कहते हैं। अगर हम कोई मंज़िल तय करते हैं, तो मक़सद भी तय करते हैं कि हम कहाँ जा रहे हैं? क्यों जा रहे हैं? अगर ऐसा न करें तो लोग हमें बेवकूफ़ कहेंगे। इसी तरह अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने हमें अपनी बंदगी (इबादत) के लिए पैदा किया है और अहकामात (आदेश) दिए हैं ताकि हम उसके मुताबिक़ अमल करके अल्लाह को—जो पूरी कायनात का ख़ालिक़ (रचयिता) है—राज़ी कर लें और आख़िरत (परलोक) के वबाल (कष्ट) से बच जाएं।
सिर्फ़ इबादत के लिए पैदा होना, यह तो रहबानियत (संसार-त्याग/वैराग्य) है जो उम्मते मुहम्मदिया (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) में नहीं है। तो इबादत का मफ़हूम (अर्थ) यह है कि हर वह रास्ता जिससे अल्लाह और उसका रसूल राज़ी हों, वह इबादत कहलाएगा; यानी दुनियावी कोई भी अमल जैसे निकाह, अगर सुन्नत और अल्लाह की मर्जी के मुताबिक़ है, तो वह अमल भी इबादत बन जाएगा। दूसरा मतलब यह है कि अल्लाह की तख़्लीक़ (सृष्टि) का मक़सद यह है कि बंदों को मेरी मअरिफ़त (पहचान/ज्ञान) हासिल हो। वह कैसे? अल्लाह की बनाई हुई चीज़ों में सोच-विचार और चिंतन (تدبر و تفکر) करने के बाद। जब हमें अपने ख़ालिक़ (सृष्टि-कर्ता) की मअरिफ़त हासिल हो जाएगी, तो इबादत हमारा असली मक़सद बन जाएगी और दुनिया व आख़िरत में सुर्ख़रुई (सफलता) हासिल होगी।
अल्लाह हम सबको अपनी मर्जी के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
लेखक: मौलाना नदीम क़ासमी