अभी एक गीत चला है, "तुझ में रब दिखता है यारा, मैं क्या करूँ? सजदे सर झुकता है यारा, मैं क्या करूँ?" इसको गाना और सुनना कैसा है? क्या इससे कुफ्र लाज़िम आएगा वगैरह?
इस सवाल का जवाब देते हुए हज़रत-ए-अक़दस मौलाना मुफ़्ती अहमद साहब खानपुरी लिखते हैं कि इसमें तफ़सील यह है कि अगर गाने वाला यह जानता है कि यह कुफ़्रिया अमल है, इसके बावजूद वह इसे गा रहा है, चाहे लह्व व लअब (मनोरंजन) या मज़ाक के तौर पर गा रहा हो या वास्तव में गा रहा हो, दोनों सूरतों में वह ईमान से निकल जाता है।
और अगर जब्र व इकराह (ज़बरदस्ती और मजबूरी) की वजह से या बतौर ख़ता (ग़लती से) गा रहा है, तो ईमान से नहीं निकलेगा।
और अगर अपनी जहालत की वजह से उसे यह मालूम नहीं है कि यह कुफ़्रिया अमल है और वह अपनी मर्ज़ी से गा रहा है, तो उसके काफ़िर होने में इख़्तिलाफ़ है।
‘माला बुद्द मिंहू’ में है: अगर कोई जाहिल (अज्ञानी) कलिमा-ए-कुफ़्र बोले और वह नहीं जानता कि यह कलिमा-ए-कुफ़्र है, तो कुछ उलमा फ़रमाते हैं कि वह काफ़िर नहीं होगा और जहालत उज़्र (माफ़ी का कारण) है, और कुछ उलमा फ़रमाते हैं कि वह काफ़िर हो जाएगा, जहालत उज़्र नहीं है।
इसलिए जिन सूरतों में सबके कहने के मुताबिक़ वह काफ़िर हो जाता है और उसके कुफ़्र में इख़्तिलाफ़ नहीं है, उन तमाम सूरतों में उसके सारे आमाल बातिल हो जाते हैं, निकाह भी टूट जाता है। उसके लिए ज़रूरी है कि तौबा करे, दोबारा कलिमा पढ़कर ईमान में दाख़िल हो और निकाह भी नए सिरे से पढ़े।
और जिन सूरतों में उसके कुफ़्र में इख़्तिलाफ़ है, उन सूरतों में उसे चाहिए कि तौबा व इस्तिग़फ़ार करके तजदीद-ए-निकाह कर ले।
ان ما يكون كفر اتفاقا يبطل العمل والنكاح وما فيه خلاف يؤمر بالاستغفار والتوبة وتجديد النكاح
(शामी, जिल्द 3, सफ़हा 316)
(महमूदुल फ़तावा, जिल्द 4, सफ़हा 85-86, किताबुल ईमान वल अक़ाइद)
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किताब: अपने ईमान व आमाल की हिफ़ाज़त कीजिए।
सफ़हा नंबर: 76-77
लेखक: मुफ़्ती इम्तियाज़ बिन इस्माईल चारोलिया राजकोटी।
चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप।