मैंने देखा कि माँ अपने बेटे को आहिस्ता से मारती और बच्चे के...
Ummah Post
3 November, 2026

मैंने देखा कि माँ अपने बेटे को आहिस्ता से मारती और बच्चे के साथ ख़ुद भी रोने लगती। मैंने आगे होकर पूछा बहन क्यों बच्चे को मार रही हो जबकि ख़ुद भी रोती हो।

उसने जवाब दिया कि भाई आपको तो मालूम है कि इसके वालिद (पिता) अल्लाह को प्यारे हो गए हैं और हम बहुत ग़रीब भी हैं। मैं लोगों के घरों में मज़दूरी करती हूँ और इसकी पढ़ाई का मुश्किल से ख़र्च उठाती हूँ। यह कमबख़्त स्कूल रोज़ाना देर से जाता है और रोज़ाना घर देर से आता है। जाते हुए रास्ते में कहीं खेल-कूद में लग जाता है और पढ़ाई की तरफ़ ज़रा भी तवज्जो (ध्यान) नहीं देता। जिसकी वजह से रोज़ाना अपनी स्कूल की वर्दी (यूनिफ़ॉर्म) गंदी कर लेता है। मैंने बच्चे और उसकी माँ को थोड़ा समझाया और चल दिया।

एक दिन सुबह-सुबह सब्ज़ी मंडी कुछ सब्ज़ी वग़ैरह लेने गया तो अचानक मेरी नज़र उसी दस साला (दस साल के) बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना घर से मार खाता था। क्या देखता हूँ कि वह बच्चा मंडी में फिर (घूम) रहा है और जो दुकानदार अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी ख़रीद कर अपनी बोरियों में डालते तो उनसे कोई सब्ज़ी ज़मीन पर गिर जाती और वह बच्चा उसे फ़ौरन उठाकर अपनी झोली में डाल लेता। मैं यह माजरा देखकर परेशानी में मुब्तला हो रहा था कि चक्कर क्या है। मैं उस बच्चे को चोरी-चोरी फ़ॉलो करने (पीछा करने) लगा। जब उसकी झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह सड़क के किनारे बैठकर ऊँची-ऊँची आवाज़ें लगाकर उसे बेचने लगा। मुँह पर मिट्टी, गंदी वर्दी और आँखों में नमी के साथ ऐसा दुकानदार ज़िंदगी में पहली बार देख रहा था...

देखते-देखते अचानक एक आदमी अपनी दुकान से उठा जिसकी दुकान के सामने उस बच्चे ने नन्ही सी दुकान लगाई थी। उस शख़्स ने आते ही एक ज़ोरदार पाँव (लात) मारकर उस नन्ही सी दुकान को एक ही झटके में सारी सड़क पर फैला दिया और बाज़ू से पकड़कर उस बच्चे को भी उठाकर धक्का दे दिया। नन्हा दुकानदार आँखों में आँसू लिए दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकट्ठा करने लगा और थोड़ी देर बाद अपनी सब्ज़ी किसी दूसरी दुकान के सामने डरते-डरते लगा ली। भला हो उस शख़्स का जिसकी दुकान के सामने अब उसने अपनी नन्ही दुकान लगाई उस शख़्स ने उस बच्चे को कुछ नहीं कहा। थोड़ी सी सब्ज़ी थी जल्द ही फ़रोख़्त हो (बिक) गई। और वह बच्चा उठा और बाज़ार में एक कपड़े वाली दुकान में दाख़िल हुआ और दुकानदार को वह पैसे देकर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और बिना कुछ कहे स्कूल की जानिब (तरफ़) चल दिया। मैं भी उसके पीछे-पीछे चल रहा था। जब वह बच्चा स्कूल गया तो एक घंटा देर हो चुकी थी। जिस पर उसके उस्ताद (टीचर) ने डंडे से उसे ख़ूब मारा। मैंने जल्दी से जाकर उस्ताद को मना किया कि यतीम (अनाथ) बच्चा है इसे मत मारो। उस्ताद फ़रमाने लगे कि सर यह रोज़ाना एक घंटा देर से आता है मैं रोज़ाना इसे सज़ा देता हूँ कि डर से स्कूल टाइम पर आए और कई बार मैं इसके घर भी पैग़ाम (संदेश) दे चुका हूँ। बच्चा मार खाने के बाद क्लास में बैठकर पढ़ने लगा। मैंने उसके उस्ताद का मोबाइल नंबर लिया और घर की तरफ़ चल दिया। घर जाकर मालूम हुआ कि मैं जो सब्ज़ी लेने गया था वह तो भूल ही गया हूँ।

हस्ब-ए-मामूल (हमेशा की तरह) बच्चे ने स्कूल से घर आकर माँ से एक बार फिर मार खाई होगी। सारी रात मेरा सर चकराता रहा। अगले दिन सुबह की नमाज़ अदा की और फ़ौरन बच्चे के उस्ताद को कॉल की कि मंडी टाइम पर हर हालत में मंडी पहुँचे। जिस पर मुझे मुसबत (सकारात्मक/हाँ में) जवाब मिला। सूरज निकला और बच्चे का स्कूल जाने का वक़्त हुआ और बच्चा घर से सीधा मंडी अपनी नन्ही दुकान का बंदोबस्त करने निकला। मैंने उसके घर जाकर उसकी वालिदा (माँ) को कहा कि बहन मेरे साथ चलो मैं तुम्हें बताता हूँ आपका बेटा स्कूल क्यों देर से जाता है। वह फ़ौरन मेरे साथ मुँह में यह कहते हुए चल पड़ी कि आज इस लड़के की मेरे हाथों ख़ैर नहीं। छोडूँगी नहीं इसे आज। मंडी में लड़के का उस्ताद भी आ चुका था। हम तीनों ने मंडी की तीन मुख़्तलिफ़ (अलग-अलग) जगहों पर पोज़ीशनें सँभाल लीं और नन्ही दुकान वाले को छुपकर देखने लगे। हस्ब-ए-मामूल आज भी उसे काफ़ी लोगों से झिड़कियाँ लेनी (डाँट खानी) पड़ीं और आख़िरकार वह लड़का अपनी सब्ज़ी फ़रोख़्त करके (बेचकर) कपड़े वाली दुकान की तरफ़ चल दिया.....

अचानक मेरी नज़र उसकी माँ पर पड़ी तो क्या देखता हूँ कि बहुत ही दर्द भरी सिसकियाँ लेकर ज़ार-ओ-क़तार (फूट-फूट कर) रो रही थी और मैंने फ़ौरन उसके उस्ताद की तरफ़ देखा तो बहुत शिद्दत (तेज़ी) से उसके आँसू बह रहे थे। दोनों के रोने में मुझे ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने किसी मज़लूम पर बहुत ज़ुल्म किया हो और आज उनको अपनी ग़लती का एहसास हो रहा हो।

उसकी माँ रोते-रोते घर चली गई और उस्ताद भी सिसकियाँ लेते हुए स्कूल चला गया। हस्ब-ए-मामूल बच्चे ने दुकानदार को पैसे दिए और आज उसको दुकानदार ने एक लेडी सूट देते हुए कहा कि बेटा आज सूट के सारे पैसे पूरे हो गए हैं। अपना सूट ले लो। बच्चे ने उस सूट को पकड़कर स्कूल बैग में रखा और स्कूल चला गया। आज भी एक घंटा लेट था वह सीधा उस्ताद के पास गया और बैग डेस्क पर रखकर मार खाने के लिए पोज़ीशन सँभाल ली और हाथ आगे बढ़ा दिए कि उस्ताद डंडे से उसको मार ले। उस्ताद कुर्सी से उठा और फ़ौरन बच्चे को गले लगाकर इस क़दर ज़ोर से रोया कि मैं भी देखकर अपने आँसुओं पर क़ाबू न रख सका। मैंने अपने आपको सँभाला और आगे बढ़कर उस्ताद को चुप कराया और बच्चे से पूछा कि यह जो बैग में सूट है वह किसके लिए है। बच्चे ने जवाब दिया कि मेरी माँ अमीर लोगों के घरों में मज़दूरी करने जाती है और उसके कपड़े फटे हुए होते हैं। उसके पास जिस्म को मुकम्मल (पूरा) ढकने वाला कोई सूट नहीं है इसलिए मैंने अपनी माँ के लिए यह सूट ख़रीदा है। यह सूट अब घर ले जाकर माँ को दोगे??? मैंने बच्चे से सवाल पूछा.... जवाब ने मेरे और उसके उस्ताद के पैरों के नीचे से ज़मीन ही निकाल दी.... बच्चे ने जवाब दिया नहीं अंकल जी छुट्टी के बाद मैं इसे दर्ज़ी को सिलाई के लिए दे दूँगा और रोज़ाना थोड़े-थोड़े पैसे जमा करके सिलाई दूँगा जब सिलाई के पैसे पूरे हो जाएँगे तब मैं इसे अपनी माँ को दूँगा..

...उस्ताद और मैं यह सोचकर रोते जा रहे थे कि अभी इस मासूम को और मंडी जाना पड़ेगा, और लोगों से धक्के खाने पड़ेंगे और नन्ही दुकान लगानी पड़ेगी................... आख़िर कब तक ग़रीबों के बच्चे नन्ही दुकानें लगाते रहेंगे। आख़िर कब तक?...........

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